internet ka pyar – ऑनलाइन प्यार (5)

internet ka pyar – ऑनलाइन प्यार (5)

अंजली वर्सोवा बीचपर आकर विवेककी राह देखने लगी. उसने फिरसे एकबार अपनी घडीकी तरफ देखा. विवेकके आनेको अभी वक्त था. इसलिए उसने समुंदरके किनारे खडे होकर दुरतक अपनी नजरे दौडाई. नजर दौडाते हूए उसके विचार जा चक्र भूतकालमें चला गया. उसके दिलमें अब उसकी बचपनकी यादे आने लगी…

वर्सोवा बीच यह अंजलीका मुंबईमें स्थित पसंदीदा स्थान था. बचपनमें वह उसके मां बापके साथ यहां अक्सर आया करती थी. उसे उसके मां बाप की आज बहुत याद आ रही थी. भलेही आज वह समुंदर का किनारा इतना साफ सुधरा नही था लेकिन उसके बचपनमें वह बहुत साफ सुधरा रहा करता था. सामने समुंदरके लहरोंका आवाज उसके दिलमें एक अजीबसी कसक पैदा कर रहा था.  ( internet ka pyar )

उसने अपने कलाईपर बंधे घडीकी तरफ फिरसे देखा. विवेकको उसने शामके पांचका वक्त दिया था.

पांच तो कबके बज चूके थे … फिर वह अबतक कैसे नही पहूंचा ?…

उसके जहनमें एक सवाल उठा …

कही ट्रॅफिकमें तो नही फंस गया? …

मुंबईकी ट्रॅफिक में कब कोई और कहां फंस जाएं कुछ कहा नही जा सकता….

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